Tuesday, 25 September 2012

अष्टविनायक यात्रा - वरद विनायक गणेश




आज के मेरे इस पोस्टमें मैं आप सबको अष्टविनायक के चौथे रुप वरद विनायक गणेशके बारेमे जानकारी दूंगा

वरद विनायक गणेश
यह मंदिर मुंबई-पुणे हाइवे पर पुणे शहरसे ८० किलोमीटर दूर आये हुए खोपोलीके पास महाद मे स्थित हैं. इस जगहसे सबसे नजदीकी कर्जत रेल्वे स्टेशन हैं जो २४ किलोमीटरकी दुरी पर आया हुआ हैं.

हर मंदिरकी तरह इस मंदिरके पीछेभी एक कहानी छुपी हुई हैं. कहा जाता हैं की १६९० मै वरद विनायक गणेशजी की मूर्ति धोंडू पौदकरजी को तालाबमे से मिलि थि तब इस मुर्तिको तालाबके पास आये हुए ग्रामदेवी मंदिरमे रखा गया था. फिर १७२५ मैं कल्याण सुन्दर श्री रामजी महादेव बिवाल्करने वरद विनायाक्के मंदिरको बनवाया था जो एक छपरेसे बने हुए घर जेसा दीखता था पर अभी फिरसे मंदिरको नया बनाया गया हैं. यह मंदिर पूर्वमुखी हैं और पश्चिमकी और भगवानका तालाब आया हुआ हैं.

यहाँ स्थापित गणेश मूर्ति पूर्वमुखी हैं गणेशजी की सुंढ बाई और हैं. इस मंदिरमें एक अखंड दीपज्योत जल रही हैं जो कहा जाता हैं की १८९२से जल रही हैं. यहाँ ४ हाथीकी प्रतिमा मंदिरकी चार दिशाओमे स्थापित हैं. मंदिरका सभाक्क्ष ८ फीट - ८ फीटका हैं. मंदिर का गुमंट २५ फिट ऊँचा हैं और गुमंटके कलश उपर सोनेका ढोल चढ़ा हुआ हैं. अष्टविनायक के सभी मंदिरमेंसे सिर्फ यही एक एसा मंदिर हैं के जहा पर हर कोई गणेशजीकी प्रतिमको अपने हाथोसे छूकर पूजा कर शकता हैं.

यहाँ महाद मैं गणेशजीके आलावा और मंदिरभी हैं जिसमे शिवजीका मंदिर, विष्णुजी, गणेशजी दत्त मंदिर और सूर्यपुत्र शानिदेवके मंदिरका समावेश होता हैं.

वरद विनायक गणेश मंदिर और प्रतिमाकी तस्वीरें





Saturday, 22 September 2012

अष्टविनायक यात्रा - बालेश्वर गणेश



तिथि: २१ सितम्बर २०१२

पोस्ट: ३

स्वागत दोस्तों, मे ये आशा करा रहा हू के आप सब मेरे लिखे हुए पोस्ट पढ़ रहे हैं और उसे पसंद कर रहे हैं अब तक मेने आपको अष्टविनायक के दो रुपोके बारेमे जानकारी दी हैं आज मे आपको अष्टविनायक के तीसरे रूप बालेश्वर गणेशके बारेमे जानकारी देनेकी कोशिश करूँगा


बालेश्वर गणेश

बालेश्वर गणेश मंदिर मुंबई-गोवा हाइवे पर नागोथाने गाव से ११ किलोमीटर पहले पाली गाव मैं स्थित हैं. यहासे सबसे नजदीक करजत रेल्वे स्टेशन. इस जगह जानेके लिए मुंबईसे दो रस्ते चलते हैं एक रास्ता मुंबई-पनवेल-खोपोली-पालि का हैं जो १२४ किलोमीटरका हैं और दूसरा रास्ता मुंबई-लोनावला-खोपोली-पालि का हैं जो १११ किलोमीटरका हैं.

इस मंदिरके पीछे एक छोटे बच्चेकी कहानी जुडी हुई हैं, और मेरे हिसाबसे अगर मैं आपको वो कहानी नहीं बताऊंगा तो मेरा ये पोस्ट लिखना व्यर्थ होगा. कहानीकी शुरुआत पालिपुर के कल्याणशेठ और उनकी पत्नी इंदुमती के साथ होती हैं. विवाहके बाद काफी समय तक इनको कोई बच्चा नहीं था और फिर यह पति-पत्नी के जीवनमे एक बच्चेका आगमन होता हैं जो बालालके नामसे जाना जाता हैं. बालाल गणेशजीका बहुत बड़ा भक्त होता हैं और इसी लिए वोह अपना काफी वक्त गणेशजीकी आराधनामे व्यथित करता था. यह बात उसके पिताको कतई पसंद नहीं थी. एक दिन बालाल जंगलमें गणेशजीकी आराधनामैं मग्न था तब उसके पीताने आके उसकी आरधना भंग करदी और गणेशजी एक मूर्तिभी तोड़ दी (जो मूर्ति आज धुंदी विनायकके नामसे जनि जाती हैं और वो भी पालिमें ही स्थित हैं) और उसे एक पेड़ पे टांग दिया. पेड़पे टंगे होनेके बावजूद बालालने गणेशजीकी आराधना करना नहीं छोडा और उसकी यह भक्तिको देख गणेशजी प्रगट हुए और उसे वरदान दिया. बालालने अपने वर्दानमें गणेशजीको पालिपुर्में हमेशाके लिए रुकने को कहा बालालकी यह बात सुनके गनेश्जिने उसको एक और वरदान दिया और कहा आजेसे यहाँ जगह बालेश्वरके नामसे जनि जाएगी और तबसे पालिमैं(पालीपुर) गणेशजीकी स्थापना हो गई.

यह गणेश मंदिरका मुख पूर्व दिशाकी और हैं और यहाँ कुल दो मंदिर हैं यह मंदिर पेहली लकड़ेका हुआ करता था पर १७६० मैं नाना फदनाविसने इस मंदिरको पत्थरसे वापिस निर्माण किया. यहाँ पे मंदिरकी और दो छोटे तालाबभी हैं जिसमे से एक तालाबका इस्तेमाल सिर्फ गणेशजीकी पूजाके लिए किया जाता हैं. इस मंदिरकी खूबसूरती इसके ८ स्तंभ और बढाते हैं, इस मंदिरकओ इस तरहसे बनाया गया हैं की शर्दिके मौसंके बाद सूर्योदयके समय सूरजकी किरणें सीधी गणेशजीके मुख पर आती हैं.

कई और मुर्तिओकी तरह गणेशजीकी इस मुर्तिकोभी हीरोकी आँखसे सजाया गया हैं, गणेशजीकी यह मूर्तिकी सूढ बाई औरकी और हैं और यहकी एक और खास बात यह हैं की यहाँ गणेशजी को प्रसादमैं मोदक नहीं बल्कि बेसनके लड्डू चढ़ाये जाते हैं. इस मूर्ति का रु इस मंदिर के पीछे आये हुए पहाड़ जेसा हैं.


बालेश्वर गणेश मंदिर और प्रतिमाकी तस्वीरें









Thursday, 20 September 2012

अष्टविनायक यात्रा - सिद्धिविनायक गणेश



तिथि: २० सितम्बर २०१२ -

पोस्ट: २
 
कल पहले पोस्टके बाद मेरे कइ दोस्तोने मुझसे दरखास्तकी के कुपा करके मैं अपने पोस्ट हिंदी मे लिखू ताकि सभीलोग पढ़ शके इसीलिये आजसे मैं अपने सभी पोस्ट हिंदी मैं लिखूंगा.

जेसे के आप सब जानते हैं के मेने आप सबको दुनियाकी दिलचस्प जगहोंके बारेमे बताने का वादा किया है और मैंने अपने पहले पोस्ट मैं अष्टविनायक के पहले रूप मयूरेश्वर गणेशके बारेमे जानकारी दी. आजके इस दुसरे पोस्ट मैं आपको अष्टविनायक के दुसरे रूप सिद्धिविनायक गणेशके बारेमे जानकारी देनेकी कोशिश करूँगा.

सिद्धिविनायक गणेश

सिद्धिविनायक गणेश अहमदनगर जिल्लेमे श्रीगोंदा शहरसे ४८ किलोमीटर दूर भीमा नदीके पास सिद्धटेकमे स्थापित है. यह जगह पुणे-सोलापुर हाईवे पर आई हुई हैं, इस जगहसे सबसे नजदीकी रेल्वे स्टेशन पुणे-सोलापुर रेल्वे लाईनका दाउनद रेल्वे स्टेशन हैं जो १८ किलोमीटर दूर हैं.


एक कहानीके अनुसार यहापे गणेशजीकी स्थापनाके बाद विष्णुजीने मधु और कैताभ राक्षसका वध किया था, और यहभी माना जाता हैं के दो बड़े ऋषिमुनि श्री मोर्य गोसावी और श्री नारायण महाराज जोके केद्गावके रहनेवालेथे उनको मोक्ष यही पे मिला था.

अष्टविनायकके आठो रूपमे सिर्फ सिद्धिविनायक गणेशकी प्रतिमाकी सुंढ दाइ और हैं यह मूर्ति ३ फिट लम्बी और २.५ फिट चोदी हैं. यह मूर्ति उत्तर दिशा मुखी हैं. यह मंदिरकी खास बात यह हैं की इस मंदिरका मुख उत्तर दिशाकी और हैं, यह मंदिर एक पहाड़की टेकरी जेसी जगह पर आया हुआ हैं, एसा माना जाता हैं की इस मंदिर की और जानेवाली मुख्य सड़क पेश्वाके जनरल हरिपांत फाड़केजीने बनवाई थी. यह मुख्य मंदिर के अन्दरका दुसरा मंदिर १५ फिट लम्बा और १० फिट चोदा हैं. इस मंदिरकी प्रदक्षिणा करनेके लिए पहाडकी पूरी टेकरी घूमना पड़ेगा और जिसमे कम से कम ३० मिनिटका समय लग सकता हैं.

इस मंदिरके साथ कई कहानिया जुडी हुई हैं जिसमेसे जो सबसे ज्यादा चर्चित हैं वो कहानी पेश्वाके साथ जुडी हुई हैं कहा जाता हैं के पेशवा अपनी जनरलकी पदवी खो चूका था तब उसने इस मंदिर्की २१ प्रदक्षिणाकी और २१ दिन बाद उसको अपने उसी मान सन्मान के साथ पदवी वापस मिली थी.

सिद्धिविनायक गणेश मंदिर और प्रतिमाकी तस्वीरें









Wednesday, 19 September 2012

વિશાલ ગાંજાવાલા - ટ્રાવેલ બ્લોગ - અષ્ટવિનાયક - મોરેશ્વર/મયુરેશ્વર ગણેશ


તારીખ : 19-09-2012

પોસ્ટ : 1

હેલ્લો મિત્રો, સૌથી પહેલા તમને બધા ને ગણેશ ઉત્સવના ખુબ અભિનંદન, કહેવાય છે કે કોઈ પણ કામ કરતા પહેલા ગણેશજીનું નામ લેવામાં આવે તો કામ સફળ થાય છે, તો આજે ગણેશ ચતુર્થીના દિવસથી હું મારો પોતાનો બ્લોગ શરૂ કરવા જય રહ્યો છુ. આજથી હું અપ સૌને કંઇક ને કંઇક નવું આપવાની કોશિષ કરીશ. આજના મારા પહેલા બ્લોગનો વિષય છે અષ્ટવિનાયક એટલે કે ગણેશજીના આઠ રૂપ.

અષ્ટવિનાયક

અષ્ટવિનાયક નો અર્થ સંસ્ક્રુતમાં આઠ ગણેશ એવો થાય છે. આ આઠે ગણેશના અલગ અલગ મંદિરો ભરતના મહારાષ્ટ્ર રાજ્યમાં આવેલા છે. આ આઠે આઠ ગણેશજીના અલગ અલગ રૂપ અને મહત્વ છે. હું તમને આ ગણેશ ઉત્સવે દરમ્યાન ગણેશજીના આ આઠે રૂપોની વિસ્તારમાં માહિતી આપવાની કોશિષ કરીશ.

આઠ રૂપો
  1. મોરેશ્વર/મયુરેશ્વર ગણેશ
  2. સિદ્ધિવિનાયક ગણેશ
  3. બાલેશ્વર ગણેશ
  4. વરદ વિનાયક ગણેશ
  5. ચિંતામણી ગણેશ
  6. ગીરીજામત ગણેશ
  7. વિઘ્નહર/વિઘ્નેશ્વર ગણેશ
  8. મહાગણપતિ ગણેશ
મોરેશ્વર/મયુરેશ્વર ગણેશ

મયુરેશ્વર ગણેશનું મંદિર પુને જીલ્લાના (૮૦ કિલોમીટર દુર) મોરગાવ ગામમાં આવેલું છે. આ મંદિરને બહમની સલ્તનત દ્વારા ૧૩૪૭ થી ૧૫૨૭ની વચ્ચે કાળા કલરના પત્થરમાંથી બનાવવામાં આવ્યું છે. આ મંદિરને અષ્ટવિનાયકનું સૌથી મહત્વનું મંદિર હોવાની સાથે સાથે, ભારતના સૌપ્રથમ ગણેશ હોવાનું બિરુદ પણ આપવામાં આવ્યું છે.

ગણેશ પુરાણ પ્રમાણે ગણેશનો આ અવતાર ૬ હાથ ધરાવે છે, તેનો રંગ સફેદ છે અને તેમનું વાહન મોર છે. જેનો જન્મ શિવ અને પાર્વતી દ્વારા ત્રેતા યુગમાં સિન્ધુ રાક્ષસનો વધ કરવા માટે થયો હતો.

આ મંદિર મોરગાવની મધ્યમાં આવેલું છે. મયુરેશ્વર મંદિર ચારે બાજુથી મીનારોથી ઘેરાયેલું છે જેના કારણે તે દુરથી મસ્જીદ જેવું પણ લાગે છે. મુઘલ સમય દરમ્યાન હુમલાઓની સામે રક્ષણ મેળવવા માટે મંદિરને આરીતે બનવવામાં આવ્યું છે આ ઉપરાંત મંદિર દરેક જગ્યાએથી ૫૦ ફૂટની દીવાલથી ઘેરાયેલું છે.

આ મંદિરની બહાર એક નંદીની પ્રતિમા છે જે તમને સામાન્યપણે શિવ મંદિરમાં જોવા મળે છે. જેના પાછળની વાર્તા એમ છે કે એક વખત એક શિવ મંદિરમાં પ્રસ્થાપિત કરવા માટે આ નંદીને લઇ જવામાં આવી રહી હતી ત્યારે રસ્તામાં વાહન બગડી જવાના કરને આ નંદીને અહી ઉતારવામાં આવી જે પછી ત્યાંથી હલી જ નહિ તેથી તેની ત્યાં સ્થાપવામાં આવી છે.

અહી સ્થાપવામાં આવેલી ગણેશ પ્રતિમા મોરની સવારી કરી રહી છે, જેની સૂંઢ ડાબી છે, જેની પાસે કોઈ પણ હુમલાથી બચવા માટે નાગરજનું ઝેર છે અને આ પ્રતિમાની જોડે રિદ્ધિ અને સિદ્ધિની પ્રતિમા પણ છે. જોકે હાલની ગણેશ પ્રતિમા બ્રહ્મા દ્વારા બે વખત પવિત્ર કરવામાં આવેલી પ્રતિમા નથી . મૂળ પ્રતિમા કદમાં નાની અને રેતીના અણુઓ, લોખંડ અને હીરાની બનેલી હતી કે જને પાંડવો દ્વારા એક તામપત્રમાં બંધ કરીને હાલના પુજસ્થાનની પાછળ મુકવામાં આવે છે.

મંદિરના અને ગણેશ પ્રતિમાઓના ફોટોગ્રાફ્સ